इन दिनों झूठ की मेन्युफेक्चरिंग हो रही है,समूची राजनीति घृणा और द्वेष के इर्द-गिर्द घूम रही है:उदय प्रकाश


जयपुर - देश भर के 26 प्रदेशों से लगभग छह सौ लेखकों ने इस सम्मेलन में भाग लिया। सम्मेलन में तमिल, तेलूगु, कन्नड़, मलयालम, मराठी, बंगाली, गुजराती, उड़िया, असमिया, डोगरी, मैथिली, भोजपुरी, पंजाबी, राजस्थानी आदि विभिन्न भाषाओं के लेखकों के शामिल होने से भारतीय भाषाओं का एक अनूठा संगम लेखकों के इस सम्मेलन में देखने को मिला है। 



प्रलेस के राष्ट्रीय सम्मेलन का प्रारम्भ अभिव्यक्ति के खतरे उठाने ही होंगे सत्र से हुआजहां जाने माने चिंतक और भाषाविज्ञ गणेश एनदेवी ने सम्मेलन का उद्घाटन किया। उन्होंने मजबूती से कहा कि अब यह समय आ गया है कि समान विचारधारा के सभी लेखकीय और गैर लेखकीय संगठनों को अपने समूचे मतभेद भूलाते हुए एकजुट होकर आवाज़ उठानी होगी कि हम दुनिया को बदलना चाहते हैं। शब्दों का एक अनूठा संसार। यहां एक ओर विश्व पटल पर प्रभाव डालने वाले महत्वपूर्ण लेखकों फै़ज़ अहमद फ़ैज़ | मैक्सिम गोर्की | सिमॉन  बोउआर | चेखव | पुश्किन | भीष्म साहनी | हरिशंकर परसाई | महाश्वेता देवी | अवतार सिंह 'पाश' | सज्जाद ज़हीर | प्रभा खेतान की पंक्तियों की तख्तियां सजी हैं। वहीं दूसरी ओर किताबों का मेला लगा है। साहित्य के विविध रंगों से रूबरू करवाते तीन बहुत ख़ास दिन। 


यह समूचा परिवेश है प्रगतिशील लेखक संघ की ओर से आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन काजो 37 वर्षों के बाद  जयपुर नगरी में हुआ। प्रगतिशील लेखक संघ की ओर से आयोजित 17वें राष्ट्रीय सम्मेलन में समूचे देश से आए रचनाकार – लेखक – विचारक सम्मिलित हुए। 


प्रलेस सम्मेलन के समापन दिवस पर 26 प्रदेशों से आए प्रतिनिधियों ने प्रलेस से सम्बन्धित गतिविधियों पर अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया।प्रतिनिधियों के रिपोर्ट अध्ययन के उपरान्त चुनाव प्रक्रिया के द्वारा प्रलेस की नई कार्यकारिणी का गठन किया गया।


संरक्षक मंडल में विश्वनाथ त्रिपाठी [दिल्ली], अकील रिज़वी [इलाहाबाद], सतीश कालसेकर [महाराष्ट्र], ई वासु [केरल] चयनित हुए।  अध्यक्ष मंडल में पुन्नीलन [तमिलनाडू], खगेन्द्र ठाकुर [बिहार/झारखंड], राजेन्द्र राजन [बिहार], मुज्तबा हुसैन [तेलंगाना], काशीनाथ सिंह[उत्तर प्रदेश] राजेन्द्र शर्मा [मध्यप्रदेश], कपिल कृष्ण ठाकुर [पश्चिम बंगाल) का चयन हुआ।


तमिलनाडू के लेखक पुन्नीलन प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहेंगे, वहीं अली जावेद [दिल्ली] को कार्यकारी अध्यक्ष चुना गया ।  प्रलेस के महासचिव पद पर डॉ. सुखदेव सिंह सिरसा का चयन किया गया। सचिव मंडल में विनीत तिवारी [मध्यप्रदेश], डॉ.मोहनदास वल्लिकाबु [केरल], पेनुगौंडा लक्ष्मीनारायणा [आंध्र प्रदेश], डॉ. सुनीता गुप्ता [बिहार], शाहीना रिज़वी [उत्तर प्रदेश], प्रेमचंद गांधी[राजस्थान], अमिताभ चक्रवर्ती[प. बंगाल], सरबजीत सिंह [पंजाब] का चयन किया गया । वहीं इसके साथ ही राष्ट्रीय समिति में भी 71 लेखकों का चयन किया गया। राजस्थान के साहित्यकार प्रेमचंद गांधी को प्रलेस के राष्ट्रीय सचिव पद पर नियुक्त किया गया।


प्रगतिशील लेखक संघ के समस्त प्रतिनिधियों ने आने वाले समय में और अधिक मजबूती से कार्य करने का संकल्प लिया। चुनावों के उपरान्त नवनिर्वाचित सदस्यों को बधाई देते हुए, सभी सदस्यों ने मंच से लोकगीत हम होंगे कामयाब का गायन किया। 


कार्यक्रम के अन्तिम दिन की शाम को अशोक राही के निर्देशन में बने नाटक रंगीली भागमती का मंचन किया गया। यह नाटक एक राजनीतिक - सामाजिक व्यंग्य है।  


राजस्थान प्रलेस के अध्यक्ष रितुराज ने कहा कि 37 वर्षों के बाद जयपुर में इस सम्मेलन का होना एक महत्वपूर्ण परिघटना है। प्रलेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष पुन्नीलन ने स्वागत भाषण में रचनाकारों से अपील की कि वे वर्तमान में फासीवादी परिस्थितियों का अपनी कविताओं, कहानियों और रचनाओं के माध्यम से विरोध करें। प्रलेस के राष्ट्रीय महासचिव राजेन्द्र राजन ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरा बढ़ता जा रहा है। लेखकों और विचारकों की गिरफ्तारी और हत्याएं तक हो रही हैं। समय आ चुका है कि लेखक एकांतवास से बाहर आएं तथा सार्वजनिक मंचों पर अपने विचार रखें।


लोकप्रिय रंगकर्मी व कलाकार रमा पाण्डे ने लेखकों से उद्बोधन किया कि समाज का प्रतिभावान और बौद्धिक वर्ग अत्याचारी ताकतों के विरोध में अपना स्वर मुखर करे। उद्घाटन सत्र का संचालन, सम्मेलन के राष्ट्रीय संयोजक और राजस्थान प्रलेस के महासचिव ईशमधु तलवार ने किया। उन्होंने कहा कि जयपुर में 37 साल बाद इतिहास अपने आप को दोहरा रहा है। अंत में प्रलेस के सदस्य सचिव प्रेमचंद गांधी ने धन्यवाद ज्ञापन किया। 


प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय अधिवेशन के दूसरे दिन समाज में शोषित वर्ग की पीड़ाओं पर चर्चा हुई, वहीं आज़ाद कलम के दायरे पर संवाद हुआ। फासीवाद, राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक प्रतिरोध विषय पर सत्र हुआ, वहीं भारतीय भाषाओं में प्रगतिशील साहित्य विषय पर व्यापक चर्चा हुई। कलम की आज़ादी से जुड़े सत्र में देश के विख्यात पत्रकार, राजनीतिक टिप्पणीकार तथा लेखक परंजॉय गुहा ठाकुरता ने कहा कि हमारी समूची दुनिया इंटरनेट तक सिमट कर रह गई है। व्यक्तियों से अधिक देश में सिम है। वॉट्सअप यूनिवर्सिटी पर झूठ का पुंलिदा धड़ल्ले से बिक रहा है।


इन हालात में लोगों को सतर्क रहने की जरूरत है। लोकप्रिय लेखक, कवि, कथाकार और फिल्मकार उदय प्रकाश ने कहा कि इन दिनों झूठ की मेन्युफेक्चरिंग हो रही है। समूची राजनीति घृणा, अहिंसा और द्वेष के इर्द-गिर्द घूम रही है। वरिष्ठ पत्रकार, सम्पादक और वर्तमान में हरिदेव जोशी पत्रकारिता एवं जन संचार विश्वविद्यालय, जयपुर के  कुलपति ओम थानवी ने  चुप्पी को तोड़ने पर जोर देते हुए कहा - मैं बोलने के लिए उकसाता हूं। घास चरने के लिए नहीं कहता। इस वक्त में बोलने की बहुत जरूरत है।