मां की मृत्यु पर तुम चले जाओ मैं पिता की मृत्यु पर चला जाऊंगा


हमारे बुजुर्ग एक कहानी सुनाया करते थे। श्रवण कुमार और उनके अंधे माता की। तब उस कहानी का अर्थ हमें नहीं आता था।मग्गा धरती,उसका नाम आता था। जिसका अर्थ "बेपीर धरती"था। कहते थे उसमें ही महाभारत का युद्ध लड़ा गया। जो चंद धरती के लिए लड़ी गई। उसमें भाई भाई आपस में लड़ें ,नारी धर्म की रक्षा तो दूर उसे भरी सभा में वस्त्र हीन करना बहादुरी  दिखाना था।


         कहानी आगे कहती है कि श्रवण कांवर में रख कर माता पिता को देशाटन करवाया करते थे।जब वे इस धरती से गुजर रहे थे तब उनका मन भ्रांति में फंस गया कि इन्हें कंधे में लादकर ले जा कर मुझे क्या लाभ है। अच्छा है इन्हें किसी कुंए बावड़ी में डाल दूं, इसी उहापोह में वह अगली धरती में पग बढ़ाने लगा, उसकी तंद्रा टूटी माता पिता को झटके के साथ कुछ आभास हुआ तो पूछ बैठे बेटा क्या हुआ तब श्रवण ने मन की बात कह डाली कि मेरे मन में पाप  बैठ गया था ,वे बोले यह तुम्हारा दोष नहीं इस धरती का कसूर है।
       यही कहानियां हमने पढ़ी और पढ़ाई हैं किंतु आज हम देखते हैं कि वे श्रवण पूरी तरह बदल गये हैं। मैं ऐसे लोगों को जानता हूं जिनकी कहानी आहत करने वाली है। सिद्धार्थ  रामू नई विधा से पोस्ट करते हुए। लिखते हैं कि लखनऊ के एक रिटायर्ड कर्नल साहब ने अपने बच्चों को इस योग्य बनाया कि दोनों एक नामी  गिरामी कम्पनी में अमेरिका में नौकरी करने लगे दोनों भाई अलग अलग स्थान में रहा करते थे। कर्नल साहब और उनकी पत्नी लखनऊ में ही रहते थे। दुर्भाग्य से मेम साहब चल बसी, उन्होंने ने मां की मृत्यु का समाचार भेजा ,कि वे मां को कंधा देने आए। बेचारे अपनी सहभागिता के पास बैठ बैटों के आने की प्रतीक्षा करने लगे। एक दिन के पश्चात छोटा चिंटू लखनऊ पहुंचा , बडे़ बेटे के बारे में पूछा तो चिंटू ने बताया कि भाई ने कहा मां की मृत्यु पर तुम चले जाओ मैं पिता की मृत्यु पर चला जाऊंगा।


: कर्नल साहब का दुःखी मन आहत हो उठा उन्होंने ने एक पत्र लिखा। प्रिय बेटों, मैंने और तुम्हारी मां ने जिस अरमानों के साथ तुम्हें पाला पोसा और ऐसा  बनाया कि तुम उच्च शिक्षा ग्रहण कर योग्य बनोगे। आज तुम्हारी मां तुम्हारे इंतज़ार में थी कि मैं तुम्हें गले लगा सकूं। अन्तिम आशीर्वाद और दर्शनके लिए उसकी सांसें तुम्हारे इंतज़ार में थी।मैं इस आशा में था कि तुम मुझे सहारा दोगे,ढांढस बंधाओगे। लेकिन तुम्हें मेरी मृत्यु कीअधिक  प्रतीक्षा नहीं करनी होगी। वे अंदर गए एक आवाज ठांय के साथ उनकी जीवन लीला भी सहधर्मिणी के साथ सम्मिलित हो गई।
दूसरी कहानी दिल्ली की है। बुजुर्ग व्यक्ति हैं, भाग्य के मारे, एक बेटा था दुर्घटना का शिकार हो गया, मां बेटे के वियोग में चल बसी। बहू को बेटे की जगह नौकरी मिल गई। बेटियां जवान हुई। दादा ने धूम धाम से उन्हें घर से विदा किया। आज बहू ने उन अपंग बृद्ध बुजुर्ग को घर से निकाल दिया। ये कर्मफल हैं या इस बेदर्द धरती की कहानी। तीसरी एक अत्यंत बुजुर्ग महिला,जिसकी न तो कोई बृद्धा पेंशन है नहीं आय का कोई श्रोत।बेटे तीन हैं लेकिन बहुएं नहीं चाहती,बेचारी बिधवा बेटी के साथ रहती हैं। ये तो हमारा इशारा दूसरों की तरफ जा रहा है हमारा क्या होगा कहना भविष्य के गर्भ में छिपा है। यह किसी के अपमान की कहानी नहीं है। हमारे संस्कारों की कमी को बयां करती है यही कहा जा सकता है कि आज आदमी अभिशप्त बनता जा रहा है। 
 ईश्वर हम सब को सद्बुद्धि प्रदान करें। ऐसे व्यक्तियों के परिवार से क्षमा प्रार्थी हूं जो इस के शिकार हैं।