राजनीति के दांव-पेंच खेलने से जनता का हित नहीं होता

राजयोग के लिए भाग्य और कर्म दोनों की आवश्यकता होती है। शासन सत्ता में आने के लिए साम दाम और दंण्ढ भेद की जहां आवश्यकता मानी गई है। वहीं एक कुशल राजनीतिज्ञ अपनी रण नीति से साम्राज्य को भी प्राप्त कर लेता है।गुलाम वंश का प्रथम राजा इसका उदाहरण है। वह गुलाम जब सेना नायक बना उसने अपने ही राजा को मार कर राज सिंहासन प्राप्त कर दिया। दिल्ली के सिंहासन पर कांग्रेस और भाजपा के शासन को भी केजरीवाल ने इसी प्रकार से हासिल किया , तीसरी विजय का डंका बजाने में उनकी सफलता की कहानी चाहे जो भी लोग गलत या सही गिन रहे हों लेकिन उनका बहुमत से जीतकर आना भाजपा और कांग्रेस की करारी हार ही मानी जा सकती है।



जितने दंश केजरीवाल को दिये गये, इतनी पीड़ा तो सतर साल राज करने वाली कांग्रेस को भी नहीं पहुंचाई गई। अलबत्ता कांग्रेस ने थोड़े बहुत शब्दों में कह भी दिया हो, किंतु भाजपा और उसके अन्य शहरों के अनर्गल सहयोगियों ने क्या क्या नहीं कहा अधिकांश बाहरी लोगों द्वारा दिल्ली के लोगों का उपहास किया जाना, दिल्ली के लोगों को बिकाऊ की संज्ञा देना, और हीन भावना से प्रताड़ित करना ठीक नहीं था। ऐसे लोग जिनका दिल्ली से लेना देना नहीं, नहीं वे मतदाता हैं भड़काने वाले ही कहे जा सकते हैं। भाजपा की हार और कम सीटें आना इसका मुख्य कारण है।आज भी सांप भाग गया लेकिन लकीर पीटने का ही काम हो रहा है। अच्छा होता इसकी समीक्षा दिल्ली के मतदाता करते।


दिल्ली के दंगों की लेकर दूसरे शहर वाले परेशान हों और दिल्ली वाले सहयोग न करें, अपने ही हक में घातक है। कोई भी गुनाहगार ,आतंकी जनहानि करने वाला ,समाज को बांटने वाला बड़े से बड़े नेता को कठोर से कठोर दिया जाना चाहिए। प्रदेशों में सरकारें मिल जुल कर काम करें, केंद्र और राज्य सरकारें जनहित में  विकास लिए  प्रतिबद्ध हों। भारत का विकास कैसे हो , हमारा लक्ष्य उसके हितार्थ होना चाहिए।  दिल्ली में शांति कैसे रखी जाय, इसके लिए दिल्ली सरकार को केंद्र से सहयोग लेना चाहिए। राजनीति के दांव-पेंच खेलने से जनता का कोई हित नहीं होता है आशा की जाती है केंद्र तथा दिल्ली सरकार आपसी सामंजस्य बिठाते हुए जनहित में योगदान देने की कृपा करेंगे।