लफ़्जों के ज़ायके


डॉ• मुक्ता
'लफ़्जों के भी ज़ायके होते हैं। परोसने से पहले चख लेना चाहिए।' गुलज़ार जी का यह कथन महात्मा बुद्ध के विचारों को पोषित करता है कि 'जिस व्यवहार को आप अपने लिए उचित नहीं मानते, वैसा व्यवहार दूसरों से भी कभी मत कीजिए' अर्थात् 'पहले तोलिए, फिर बोलिए' बहुत पुरानी कहावत है। बोलने से पहले सोचिए, क्योंकि शब्दों के घाव बाणों से अधिक घातक होते हैं; जो नासूर बन आजीवन रिसते रहते हैं। सो! शब्दों को परोसने से पहले चख लीजिए कि उनका स्वाद कैसा है?


यदि आप उसे अपने लिए शुभ, मंगलकारी व स्वास्थ्य के लिए लाभकारी मानते हैं, तो उसका प्रयोग कीजिए, अन्यथा उसका प्रभाव प्रलयंकारी हो सकता है, जिसके विभिन्न उदाहरण आपके समक्ष हैं। 'अंधे की औलाद अंधी' था...महाभारत के युद्ध का मूल कारण...सो! आपके मुख से निकले कटु शब्द आपकी वर्षों की प्रगाढ़ मित्रता में सेंध लगा सकते हैं; भरे-पूरे परिवार की खुशियों को ख़ाक में मिला सकते हैं; आपको या प्रतिपक्ष को आजीवन अवसाद रूपी अंधकार में धकेल सकते हैं। इसलिए सदैव मधुर वाणी बोलिए और तभी बोलिए जब आप समझते हैं कि 'आपके शब्द मौन से बेहतर हैं।' समय, स्थान अथवा परिस्थिति को ध्यान में रखकर ही बोलना सार्थक व उपयोगी है, अन्यथा वाणी विश्राम में रहे, तो बेहतर है।


मौन नव-निधि के समान अमूल्य है। जिस समय आप मौन रहते हैं... सांसारिक माया-मोह, राग-द्वेष व स्व-पर की भावनाओं से मुक्त रहते हैं और आप अपनी शक्ति का ह्रास नहीं करते; उस प्रभु के निकट रहते हैं। यह भी ध्यान की स्थिति है; जब आप  निर्लिप्त भाव में रहते हैं और संबंध सरोकारों से ऊपर उठ जाते हैं... यही जीते जी मुक्ति है। यही है स्वयं में स्थित होना; स्वयं पर भरोसा रखना; एकांत में सुख अनुभव करना... यही कैवल्य की स्थिति है; अलौकिक आनंद की स्थिति है; जिससे मानव बाहर नहीं आना चाहता। इस स्थिति में यह संसार उसे मिथ्या भासता है और सब रिश्ते-नाते झूठे; जहां मानव के लिए किसी की लेशमात्र भी अहमियत नहीं होती।


सो! ऐ मानव, स्वयं को अपना साथी समझ। तुमसे बेहतर न कोई तुम्हें जानता है, न ही समझता है। इसलिए अन्तर्मन की शक्ति को पहचान; उसका सदुपयोग कर; सद्ग्रन्थों का निरंतर अध्ययन कर, क्योंकि विद्या व ज्ञान मानव का सबसे अच्छा व अनमोल मित्र है, सहयोगी है; जिसे न कोई चुरा सकता है; न बांट सकता है; न ही छीन सकता है और वह खर्च करने पर निरंतर बढ़ता रहता है। इसका जादुई प्रभाव होता है। यदि आप निर्दिष्ट मार्ग का अनुसरण करते हैं, तो मन कभी भी भटकेगा नहीं और उसकी स्थिति 'जैसे उड़ि-उड़ि जहाज़ का पंछी, उड़ी-उड़ी जहाज़ पर आवै' जैसी हो जाएगी। उसी प्रकार हृदय भी परमात्मा के चरणों में पुनः लौट आएगा। माया रूपी महाठगिनी उसे अपने मायाजाल में नहीं बांध पायेगी।


वह अहर्निश उसके ध्यान में लीन रहेगा और लख चौरासी से जीते जी मुक्त हो जाएगा, जो मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य है…  और उसकी मुख्य शर्त है; 'जल में कमलवत् रहना अर्थात् संसार में जो हो रहा है, उसे साक्षी भाव से देखना और उसमें लिप्त न होना।' इस परिस्थिति में सांसारिक माया-मोह के बंधन व स्व-पर के भाव उसके अंतर्मन में झांकने का साहस भी नहीं जुटा पाते। इस स्थिति में वह स्वयं तो आनंद में रहता ही है, दूसरे भी उसके सान्निध्य व संगति में आनंद रूपी सागर में अवगाहन करते हैं, सदा सुखी व संतुष्ट रहते हैं। इसलिए 'कुछ हंस कर बोल दो,/ कुछ हंस कर टाल दो/ परेशानियां तो बहुत हैं/  कुछ वक्त पर डाल दो' अर्थात् जीवन को आनंद से जियो, क्योंकि सुख-दु:ख तो मेहमान हैं, आते-जाते रहते हैं। इसलिए दु:ख में घबराना कैसा...खुशी से आपदाओं का सामना करो। यदि कोई अप्रत्याशित स्थिति जीवन में आ जाए, तो उसे वक्त पर टाल दो, क्योंकि समय बड़े से बड़े घाव को भी भर देता है।


मुझे स्मरण हो रही हैं, गुलज़ार जी की यह पंक्तियां 'चूम लेता हूं/ हर मुश्किल को/ मैं अपना मान कर/ ज़िदगी जैसी भी है/ आखिर है तो मेरी ही' अर्थात् मानव जीवन अनमोल है, इसकी कद्र करना सीखो। मुश्किलों को अपने जीवन पर हावी मत होने दो। जीवन को कभी भी कोसो मत, क्योंकि ज़िंदगी आपकी है, उससे प्यार करो। उन्हीं का यह शेर भी मुझे बहुत प्रभावित करता है... 'बैठ जाता हूं/ मिट्टी पर अक्सर/ क्योंकि मुझे अपनी औक़ात अच्छी लगती है।' जी! हां, यह वह सार्थक संदेश है, जो मानव को अपनी जड़ों से जुड़े रहने को प्रेरित करता है और यह मिट्टी हमें अपनी औक़ात की याद दिलाती है कि मानव का जन्म मिट्टी से हुआ और अंत में उसे इसी मिट्टी में मिल जाना है। सो! मानव को सदैव विनम्र रहना चाहिए, क्योंकि अहं मानव का सबसे बड़ा शत्रु है। सो! इसे अपने जीवन में कभी भी प्रवेश नहीं करने देना चाहिए, क्योंकि अहं हृदय को पराजित कर मस्तिष्क के आधिपत्य को स्वीकारता है।


इसलिए मस्तिष्क को हृदय पर कभी हावी न होने दें, क्योंकि यह मानव से गलत काम करवाता है। स्वयं का दर्द महसूस होना जीवित होने का प्रमाण है और दूसरों के दर्द को महसूस करना इंसान होने का प्रमाण है। सो! मानव को आत्म- केन्द्रित अर्थात् निपट स्वार्थी नहीं बनना चाहिए; परोपकारी बनना चाहिए। 'अपने लिए जिए, तो क्या जिए/ तू जी ऐ दिल/ ज़माने के लिए।' औरों के लिए जीना व उनकी खुशी के लिए कुर्बान हो जाना...यही मानव जीवन का उद्देश्य है अर्थात् 'नेकी कर, कुएं में डाल' क्योंकि शुभ कर्मों का फल सदैव अच्छा व उत्तम ही होता है।


'कबिरा चिंता क्या करे/ चिंता से क्या होय/ मेरी चिंता हरि करें/ मोहे चिंता न होए।' कबीरदास जी का यह दोहा मानव को चिंता त्यागने का संदेश देता है कि चिंता करना निष्प्रयोजन व हानिकारक होता है। इसलिए सारी चिंताएं हरि पर छोड़ दो और आप हर पल उसका स्मरण व चिंतन करो। कष्ट व दु:ख आप से कोसों दूर रहेंगे और आपदाएं आपके निकट आने का साहस नहीं जुटा पाएंगी। 'सदैव प्रभु पर आस्था व विश्वास रखो, क्योंकि विश्वास ही एक ऐसा संबल है, जो आपको अपनी मंज़िल तक पहुंचाने की सामर्थ्य रखता है'– स्वेट मार्टन की यह उक्ति मानव को ऊर्जस्वित करती है कि सृष्टि-नियंता पर अगाध विश्वास रखो और संशय को कभी हृदय में प्रवेश न पाने दो। इससे आप में आत्मविश्वास जाग्रत होगा। विश्वास सबसे बड़ा संबल है, जो हमें मंज़िल तक पहुंचा देता है। इसलिए सपने में भी संदेह व शक़ को जीवन में दस्तक न देने दो। जीवन में खुली आंखों से सपने देखिए; उन्हें साकार करने के लिए हर दिन उनका स्मरण कीजिए और अपनी पूरी ऊर्जा उन्हें साकार करने में लगा दीजिए। स्वयं को कभी भी किसी से कम मत आंकिए... आपको सफलता अवश्य प्राप्त होगी।


जीवन में हर कदम पर हमारी सोच, हमारे बोल व हमारे कर्म ही हमारा भाग्य लिखते हैं। सो! मानव को जीवन में नकारात्मकता को प्रवेश नहीं करने देना चाहिए, क्योंकि हमारी सोच, हमारी वाणी के रूप में प्रकट होती है और हमारे बोल व हमारे कर्म ही हमारे भाग्य-विधाता होते हैं। इसलिए कहा गया है कि बोलने से पहले चख लेना श्रेयस्कर है। सो! अपनी वाणी पर नियंत्रण रखिए। सदैव सत्कर्म कीजिए। लफ़्ज़ों के भी ज़ायके होते हैं... चख कर उनका सावधानी-पूर्वक प्रयोग करना ही उपयोगी, कारग़र व सर्वहिताय है।