समय भागता जा रहा


●●● डॉ• मुक्ता ●●●


आजकल एक छत के नीचे रहते
संवाद का सिलसिला थम गया
सब अपने-अपने द्वीप में क़ैद
आत्मजों की झलक पाने को आतुर
हज़ारों ग़िले-शिक़वे मन में लिए
आंसुओं के सैलाब में डूबते-उतराते
मौन का आवरण ओढ़े
हक़ीक़त को उजागर करने में असफल
खुद से ग़ुफ़्तगू करते
और बयान करते दिल की दास्तान


आ गया यह कैसा समां
हर ओर छाया धुआं ही धुआं
और कैसा है यह विचित्र-सा दौर
घोर सन्नाटा पसरा चहुंओर
शेष रही नहीं संबंधों की गरिमा
बढ़ रहा अजनबीपन का अहसास
जहां आदमी से आदमी है अनजान
न ही कोई संबंध, न ही सरोकार
पास रहते मन की दूरियां इतनी बढ़ीं 
जिन्हें पाटना, दूर...बहुत दूर तक
नहीं मुमक़िन, सर्वथा असंभव


 कैसे रिश्ते


कैसे रिश्ते
नहीं जान पाता मन
क्यों बंधे हम इनसे
ना स्नेह, ना प्यार, ना विश्वास
ना कोई उम्मीद किसी से
फिर भी जीवन ढोते
चाहकर भी कभी मुक्त नहीं होते


 कश्तियां 


कश्तियां डूब जातीं तूफ़ान में
हस्तियां डूब जाती अभिमान में
आकाश की बुलंदियों को छूते
वे शख्स
जो मिटा डालते
सबकी खुशी के लिए
अपना अस्तित्व
और राग-द्वेष से ऊपर उठ
अहं भाव को तज
नि:स्वार्थ भाव से
सामंजस्यता की राह पर चलते
प्रतिशोध नहीं
परिवर्तन की अलख जगाते
और सबके मुरीद बन जाते


●●● डॉ• मुक्ता ●●●