ये खेल- खिलौने बहुत हुए


सुषमा भंडारी


 ये खेल- खिलौने बहुत हुए


ये खेल- खिलौने बहुत हुए
मैं लड़की अब कमजोर नहीं
हर युग में रहा है जग दुश्मन
पर बहुत हुआ अब और नहीं


झांसी में बजी थी रण भेरी$$$$$$$$$$$$री-2
दुश्मन का कोई ठौर नहीं
ये खेल- खिलौने बहुत हुए
मैं लड़की अब कमजोर नहीं


पिछड़ी-पिछड़ी सी रही सदा
लड़कों जैसा कोई गौर नहीं
पैरों पे खड़ी है अब लड़की $$$$$$$$$$$$$$$-2
लौटेगा अब वो दौर नहीं
ये खेल- खिलौने बहुत हुए
मैं लड़की अब कमजोर नहीं


अब जान लिया है सत्य को 
कमजोरी के इस तथ्य को 
मुझसे ही चलती है सृष्टि $$$$$$$'$$$$$$$-2
मुझबिन ये उज्ज्वल भोर नहीं
ये खेल- खिलौने बहुत हुए
मैं लड़की अब कमजोर नहीं


आरती का दीप 


आरती का दीप हूं मैं
मुझको न अंगार दो
भारती पर मैं समर्पित
भारती पर वार दो ।।


मुझसे रौशन देश मेरा
है उजाला हर जगह
मैं कलम का हूं सिपाही
सँग न हथियार हो।।


राम लक्ष्मण की धरा ये
हैँ यहाँ हनुमान भी
लाँघ जायेंगे समन्दर
चाहे तूफाँ धार हो ।।


नफरतों के बीज न रौपो 
दिलो- दिमाग में
आग क्या भड़काओगे
हम रोक लें चिंगार को।।


गन्ध- बारूदी, घरों से 
आ रही क्यूं हर तरफ
सूर्य हाथों में लिए हम 
बाँटते उजियार को।।


खुशबुओं से आज भर दें
ये धरा ये आस्माँ
है गढा इतिहास हमने 
जीत कर हर हार को ।।।


 अक्षर-अक्षर


अक्षर अक्षर भाव भरे हैं
मधुर मधुर हैं गीत मेरे
कवि मन मेरा मर्म है इसमें
दर्द भरे हैं गीत मेरे


झरते हैं एहसास मृदुल जब
वेणी गूँथ बनाती हूं
सुख दुख से है भरा ये जीवन 
फिर भी मैं मुस्काती हूं
कवि मन मेरा कर्म है इसमें
दर्द भरे हैं गीत मेरे


उद्गारों की लिये पोटली
इत- उत डोल रही हूं मैं
दर्द हुआ है प्याज सरीखा
छिलके खोल रही हूं मैं
कवि मन मेरा धर्म है इसमें
दर्द सभी हैं गीत मेरे


दर्द बिना ये जीवन कैसा
कैसी है जीवन की धार
दर्द अगर है जीवन में तो
समझो छिपा हुआ है प्यार
कवि मन मेरा मर्म है इसमें
दर्द भरे हैं गीत मेरे


मुट्ठी बंद है तो ये समझो
लाखों हैं अनमोल रतन
खुली मुट्ठियां बिखर गये सब 
कर ले चाहे लाख जतन
कवि मन मेरा मर्म है इसमें 
दर्द भरे हैं गीत मेरे


((सुषमा भंडारी))