खुशी // कविता



डॉ• मुक्ता


खुशी! मेरी सखी
बड़े नाज़ो-अंदाज़ से
पली-बढ़ी
रंगीन मिज़ाज
जहां रुख करती
ख़ुशियों के अंबार लगाती
उल्लसित करती
और मन की मलिनता
जाने कहां खो जाती
सुक़ून-सा दिल को आ जाता
मन पाखी
मनचाही छलांग लगाता
परंतु जहाज़ के पंछी की भांति
फिर-फिर लौट कर वहीं आता
क्योंकि खुशी को
मायूसी नहीं भाती
तनावग्रस्त चेहरा देख
जीने का अंदाज़ सिखाती
उसके न मानने पर
वह लौट जाती
जीवन में सुरूर छा जाता
दास्तान इसकी बड़ी अजब-गज़ब
हर पल नये करिश्मे दिखाती
मान-मनुहार करती
और ख़ुद ही रूठ जाती
स्वभाव इसका बहुत चंचल
पल भर भी स्थिर नहीं रह पाती


आओ! ग़मों के
अंधेरे से निकल
एक नया दीप जलाएं
खुशी के अंग-संग रहें
अपना भी नया आशियां
उसके निकट बनाएं
चमन के फूलों से चुरा लें
उनकी रंगीनियां
महक उठे मन-उपवन
बदल जाये अंदाज़ ज़िंदगी का
हम सफ़र बन
हरदम साथ निभाएं