कविता // पितृपक्ष,बहुत देर से समझ आया



स्वीटी सिंघल ‘सखी’


पितृपक्ष,
बहुत देर से समझ आया
इसका अर्थ और महत्व।
बचपन में देखा था
अपने पिता को
करते हुए तर्पण 
दादा-दादी और अन्य पूर्वजों के लिए...
साथ ही माँगते थे माफ़ी 
अनजाने में हुई किसी भूल की,
फिर करते थे दान
वस्त्र और भोजन।
पर कभी माँ ने नहीं किया
नाना-नानी के लिए ये सब।
कुछ बड़ी हुई तो पूछने पर माँ ने बताया
थोड़े दुख थोड़े रोष के साथ समझाया,
सिर्फ़ बेटे को मिलता है ये अधिकार...
तभी मिलती है माता-पिता की 
दिवंगत आत्मा को शांति,
बेटियों को तो अंतिम यात्रा में
जाने की भी अनुमति 
नहीं देती अपनी संस्कृति!
आज वर्षों बाद भी
यही रिवाज है क़ायम 
पर अब बदल चुके हैं
पारिवारिक समीकरण।
जो बेटे जीते-जी नहीं कर रहे
माँ बाप का सम्मान
नहीं रखते उनकी 
छोटी-छोटी ज़रूरतों का ध्यान,
क्या दिला सकेंगे उनकी आत्मा को मुक्ति 
देकर दान में थोड़ा सा सामान?
क्या मनाने से श्राद्ध 
हो जाएँगें माफ़ वो अपराध?
बेटियाँ जो बचपन से ही
बनाई जाती हैं ज़िम्मेदार,
क़दम क़दम पर दी जाती है सीख
कैसे निभाना है घर परिवार।
कभी जब माँ हो जाए बीमार
संभाल लेती है सब काम
बेटी उसी पल हो जाती है बड़ी,
और जब पिता हो लाचार 
तो कम करने उनका बोझ
होती है अपने पैरों पर खड़ी। 
विवाह के बाद निभाती है
दो परिवारों के संस्कार,
फिर भी कहीं से नहीं मिलता 
उसे कोई अधिकार।
कहते हैं नहीं होता 
बेटी पर कोई क़र्ज़,
फिर भी आख़िरी साँस तक निभाती है वो
अपने औलाद होने का फ़र्ज़।
नहीं चाहती बेटियाँ 
संपत्ति में समानाधिकार,
दे सकते हैं तो दें उन्हें
बेटों जितना प्यार
और सम्मानित व्यवहार।
जिन माँ बाप पर लुटाती हैं
वे जीवन भर प्यार,
क्यूँ नहीं मृत्यु पर्यंत उन्हें 
अग्नि देने और तर्पण करने 
का अधिकार??