समीक्षा के विविध आयाम' साहित्य की बहुविध 75 कृतियों की समीक्षाओं का संग्रह

पुस्तक-समीक्षा के विविध आयाम,लेखिका -सुरेखा शर्मा,प्रकाशक-हरियाणा प्रादेशिक हिंदी साहित्य सम्मेलन गुरुग्राम
प्रथम संस्करण-2022,पृष्ठ संख्या -264,मूल्य--500/-


डॉ.अशोक कुमार'मंगलेश'0

उत्तर आधुनिकतावादी आलोचना पद्धति को आधार बनाकर बहुविज्ञ-निष्णात समीक्षक सुरेखा शर्मा द्वारा रचित 'समीक्षा के विविध आयाम' साहित्य की बहुविध 75 कृतियों की समीक्षाओं का संग्रह हैंI संग्रह साहित्यालोचन एवं गहन चिंतन-मनन से लबरेज शोधात्मक एवं विश्लेषणात्मक समीक्षाओं की सुंदर व आकर्षक कृति हैI भाषाविद प्रो. नरेश मिश्र की भविष्यवेदी दृष्टि ने समीक्षक के लेखन की नवीनता, मौलिकता और गहनता को सही संदर्भ में समझते हुए कृति को 'अत्यंत प्रभावी और अनुप्रेरक आलोचनात्मक कृति' घोषित किया है, जो समीचीन है।

आलोचना, समालोचना अथवा समीक्षा आदि शब्दों में तात्पर्यायांतर होते हुए एक मूल रूप भी यथार्थतया एक है जो वर्तमान परिप्रेक्ष्य में एक ही अर्थ से ध्वनित होते हैं। आलोचना साहित्य की एक अनूठी एवं कठिन विधा हैI किसी पुस्तक के गुण-दोषों का निरूपण, विवेचना या गवेषणा करना अथवा उपयुक्तता का आदर्श विवेचन प्रस्तुत करने वाली साहित्यिक विधा आलोचना हैI अर्थात आलोचना का कर्तव्य सृजनात्मक कृति का विश्लेषणात्मक आईना प्रस्तुत करना है जहां बौद्धिक और तार्किक तत्व प्रधान होते हैंI समीक्षा का विषय काव्य अथवा साहित्य है और समीक्षक अपने समीक्षण विषय का पुन:सृजन करता है। यदि हम साहित्य को जीवन का राग माने तो आलोचना को इस राग का राग मानना पड़ेगाI वस्तुतः प्रस्तुत पुस्तक में इस समीक्षण राग को परिपक्व बौद्धिक और तार्किक चेतना की शक्तिस्वरूपा 
सुरेखा शर्मा ने अपने नीर-क्षीर और विवेक के गुणों से सराबोर किया है।

साधारणतः कहा जा सकता है कि जितने प्रकार के साहित्यिक विषय होंगे उतने ही प्रकार की आलोचना पद्धति भी होंगी। किसी कृति की समीक्षा करते समय समीक्षक किन बातों का विशेष ध्यान रखता है, उस रचना की उसके मन- मस्तिष्क पर क्या प्रतिक्रिया उपजती है और किस सीमा तक वह उससे प्रभावित होता है, समीक्षा का स्वरूप बहुत कुछ इसी बात पर निर्भर करता है। परंतु कुछ आलोचकों का मंतव्य यह भी है कि किसी कृति की परख- निरख ज्यों-की- त्यों करने में ही आलोचना के अर्थ की चरम अभिव्यक्ति है। फिर प्रश्न उठता है, इस तर्क की कसौटी क्या होनी चाहिए? वस्तुतः मेरा मानना है आलोचना का अर्थ आलोचक की अपनी रुचि न होकर, साहित्य की श्रेष्ठता एवं प्रगतिशील मानदंड होने चाहिए। यही कारण है कि श्रेष्ठ आलोचक अथवा स्थापित साहित्यकार श्रेष्ठ कृतियों को श्रेष्ठ घोषित करने में कभी संकोच नहीं करते और न ही सीमित परिवेश में उसकी समीक्षा करते हैं, चाहे वह रुचिकर प्रतीत हो या न हो। निसंदेह गत सदी में हिंदी आलोचना का व्यापक, गहन और बहुआयामी विकास हुआ है। 

सृजनात्मक कृतियों की समीक्षा का क्षेत्र अपेक्षाकृत पहले से अधिक व्यापक हुआ है। पिछली सदी का अंत तो विभिन्न विमर्शों; यथा- दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श, नारी विमर्श, जनवादी विमर्श, किन्नर विमर्श और न जाने क्या-क्या... में गुजरा है। और तो और साहित्य और साहित्यकार तक खेमे में बंटा दिखाई देता है। आज प्रश्न किए जाने लगे हैं कि आप किस खेमें, विषय अथवा विमर्श या क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करते हैं आदि- आदि। साहित्यकार किसी दल, पक्ष, सम्प्रदाय, मत , विचारधारा के प्रतिबद्ध नहीं होना चाहिए, साहित्यकार अभिव्यक्ति के लिए स्वतंत्र होता है। साहित्य की प्रतिबद्धता मानव जीवन और जीवन मूल्यों की प्रतिस्थापन के प्रति निर्विवाद रूप से होनी चाहिए। अतः साहित्यरूपी सामाजिक दर्पण तैयार करने वाला ही साहित्यकार होता है। प्रबुद्ध विदुषी सुरेखा शर्मा के समीक्ष्य लेखन में निरपेक्ष रूप से सर्जक की प्रेरक शक्तियों और उसकी रचना-प्रक्रियाओं के विविध अंगों का विश्लेषण प्रस्तुत करने की क्षमता है और समाज के गौरव के दीप्तिमान दर्शन होते हैं।

वर्तमान में सृजन और समीक्षा के अंत:संबंध को लेकर उमड़ने वाले अनेक प्रश्न हमारे लिए चुनौती बन गए हैं। इसका स्पष्ट कारण है कि आज भी विद्वान ऐसे कुछ पुराने प्रश्नों में उलझे हैं कि रचना बेहतर है कि आलोचना अथवा रचना आलोचना का मार्ग प्रशस्त करती है कि आलोचना रचना का। इस चुनौती का सामना हम तभी कर सकते हैं जब हम इससे दो कदम आगे बढ़े, रचना और आलोचना के संदर्भ में दिल और मस्तिष्क के रिश्ते की बात करें, या फिर रचना का संबंध कारयित्री प्रतिभा से और समीक्षा का संबंध भावयित्री प्रतिभा से स्थापित करने में मरुस्थल और मरुद्यान के कुलाबे मिलाने का संघर्ष करें, प्रयास करें। ऐसी ही एक समीक्षक हैं सुरेखा शर्मा जी जो प्रत्येक राग-द्वेष और पूर्वग्रह की गंदगी से सर्वथा रहित कुनीन की गोली की भांति मीठे आवरण में लपेटकर सर्जना करती हैं। संवेदनशील और सहानुभूति सम्पन्न समीक्षक सुरेखा का कहना है कि 'जिसे शरबत पिलाकर मारा जा सकता है, तो उसे जहर देने की क्या जरूरत है और जब फुफकारने से काम चल जाए तो काटने की क्या आवश्यकता है?' अतः उनकी आलोच्य दृष्टि में पुराने मूल्य, परम्पराएं, नई संवेदनाएं और परिपक्व अनुभूति की ग्रहणशीलता समाहित है।

सृजन, सर्जक और पाठक के बीच कड़ी रूप में खड़ा प्रहरी आलोचक है। इस त्रिवेणी के बीच सब मुश्किलों को पार कर, आगे बढ़कर समन्वय स्थापित कर लिखना ही आलोचना अथवा आलोचक का ध्येय होता है I ‘समीक्षा के विविध आयाम' संग्रह में संगृहीत समीक्षाओं के शुभारंभ से शुभांत तक गुजरते हुए जिस नीर-क्षीर-विवेक से साक्षात्कार हुआ वह वर्णातीत है, श्लाघनीय है। तत्वभाषी समीक्षक ने पूर्णतः आलोचना की त्रिवेणी को सींचने और पोषने का प्रयास किया है। वस्तुतः सुरेखा शर्मा वह चरवाहा है जो मेमनों को मारे बगैर ही उनकी ऊन उतारने में सफल हुई हैं। आज के पाठक व सर्जक को, आज के आलोचक अथवा समीक्षक से इसी समझदारी की अपेक्षा है।

बहुत दिनों के बाद इतनी सुंदर, सारगर्भित और शोधात्मक समीक्षाएं पढ़ने को मिली हैं। बहुत कम पत्रिकाएं हैं 'भाषा' जैसी जिनमें लंबी, गहन और गम्भीर गवेषणाएं छपती हैं। प्रकृत पुस्तक में संगृहीत समीक्षाओं को पढ़ने के बाद कोई भी तटस्थ व्यक्ति अपने विचार दिए बिन नहीं रह सकता। चूंकि आज कौन इतनी ईमानदारी, गम्भीरता और तटस्थता से समीक्षाएं लिखता है। बस! वही घिसी- पिटी शब्दावली में चार शब्द लिखकर विज्ञापन रूपी समीक्षाएं ही पढ़ने को मिलती है। सुधी शोधक सुरेखा शर्मा ने आलोचक की पैनी नजर से बहुविध आलोच्य कृतियों की खूबियों के साथ-साथ सूक्ष्म अवयवों के, सूक्ष्म अवलोकन पर भी खुलकर बातें की हैं तथा शोध व विवेचन की दृष्टि से भी उच्च स्तर तक पहुंचने का सफल प्रयास किया हैI समीक्षक ने कृतियों में रचित वर्तमान समय की समस्याओं को बड़ी ही सुंदरता से पाठकों के सम्मुख रखा हैI वस्तुतः सभी समीक्षाएं स्तरीय, शोधपरक और उपादेय बन पड़ी हैंI एक और विशेष बात यह है कि किसी भी शोधार्थी या लेखक के लिए बहुविध मूल्यांकन विषय पर इतना अधिक समीक्षात्मक अध्ययन अन्यत्र मिलना असंभव है, इसलिए भी प्रकृत पुस्तक की उपादेयता और उपयोगिता बढ़ जाती है। निश्चित ही, इससे कवि, लेखक, समीक्षक व शोधार्थी बहुत अधिक लाभान्वित होंगेI

असल में, पुस्तक का दूसरा एक अलग पहलू देखा जाए तो यह पुस्तक हिंदी गगन के देदीप्यमान नक्षत्र साहित्यकारों की आपसी दूरियां मिटाने का भी एक सफल और सार्थक प्रयास कही जा सकती है जिसका आज अभाव दृष्टव्य है। मैं यहां साहित्य परीक्षक अथवा अंपायर की विलक्षण प्रतिभा को भी नमन करता हूँ जो इतने बड़े साहित्यिक वृंद की सर्जनात्मक कृतियों के मूल्यांकन के बाद इसे आलोच्य पुस्तकाकार एवं प्रकाशित कराने जैसा महती कृत्य भी किया है। साथ ही, हरियाणा प्रादेशिक हिंदी साहित्य सम्मेलन, गुरुग्राम भी बधाई के पात्र हैं।

भाव भाषा और शैली की दृष्टि से तत्वांवेषक समीक्षक सुरेखा शर्मा ने अपने उत्तम विचारों, नवीन उद्भावनाओं से सम्पन्न आलोचना-दृष्टि का अद्वितीय परिचय देते हुए एक सुविज्ञ काव्य-मीमांसक के गम्भीर, तटस्थ एवं बौद्धिक अध्ययन-चिंतन के सार्थक प्रमाण दिए हैं जो उन्हें आधुनिक आलोचकों की विशिष्ट श्रेणी में परिगणित करते हैं। अतः पुस्तक सहज, सरल भाषा एवं शोधपरक शैली की दृष्टि से पठनीय एवं संग्रहणीय है। अंत में, मूल चेतना के प्रसार की सूचक विवेच्य कृति 'समीक्षा के विविध आयाम' के लिए सुरेखा शर्मा को इस उच्चस्तरीय समीक्षाओं के प्रकाशन व पुनीत अनुष्ठान के लिए हृदय से बधाई देता हूँ और आशा करता हूँ कि भविष्य में भी वह अपनी नीर- क्षीर विवेकपूर्ण गुणों से, नूतन विचारों और नवीन उद्भावनाओं के साथ इसी निष्ठा और लगन से हिंदी साहित्य में श्रीवृद्धि करती रहेंगी। 

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