टूटे भेदभाव की दीवार, दूर हो अकेलापन' जेकेके में 'द ज़ू स्टोरी' नाटक का मंचन

० अशोक चतुर्वेदी ० 

जयपुर : इंसान की खींची गयी लकीरें जो उसे एक दूसरे से अलग—थलग कर रही हैं। कहीं रंग भेद, कहीं धर्म तो कहीं जाति और राजनीतिक हित साधने के लिए पैदा किया गया भेदभाव व आर्थिक ऊंच—नीच, ये सभी इंसान के जीवन के लिए घातक बनते जा रहे हैं। इन सभी भावों को व्यक्त करने के उद्देश्य से जवाहर कला केंद्र में 'द ज़ू स्टोरी' नाटक का मंचन किया गया। रमेश भाटी नामदेव के निर्देशन में हुए नाटक ने दर्शकों की खूब वाहवाही लूटी। जेकेके की पाक्षिक नाट्य योजना के तहत कार्यक्रम का आयोजन किया गया था।

 'ज़ू की तरह है इंसानी जीवन' द ज़ू स्टोरी अमरीकी लेखक एडवर्ड एल्बी द्वारा लिखा गया है। इसके दो पात्रों जैरी व पीटर की कहानी को रंगकर्मियों ने मंच पर जाहिर किया। दर्शाया गया कि जैरी जो अति वाचाल प्रवृत्ति का है, स्वयं से हो रहे भेदभाव से बुरी तरह कुंठित है। चीड़िया घर में जानवरों से होने वाले विभेद का उदाहरण देते हुए जैरी इंसानी वर्ग भेद को जाहिर करता है। भेदभाव की जंजीरों में जकड़ा जैरी चाहता है कि इंसान आपस में भेदभाव नहीं करे। ...सहयोग नहीं दिखावा! अकेलेपन जूझ रहे जैरी को सहयोग का दिखावा करने की दुनिया की आदत रास नहीं आती। अब वह अपनी जीवन लीला समाप्त करना चाहता है। इस पर पीटर उसे सार्वभौमिक नियम समझाने का प्रयास करता है कि सब को सब कुछ नहीं मिलता। 

पीटर की अंतरमुखी प्रवृत्ति से ऐसा प्रतीत होता है कि वह सभ्य इंसान है। अंतत: उकसाने पर पीटर के भीतर छिपा जानवर बाहर आ जाता है और जैरी की हत्या हो जाती है। इन्होंने डाली नाटक में जान नाटक की जान बने जैरी और पीटर का रोल क्रमश: डॉ. हितेंद्र गोयल व श्री मज़ाहिर सुल्तान जई ने निभाया। मंच से परे श्री गगन मिश्रा ने लाइट, श्री एस.पी रंगा और श्री नेमीचंद ने संगीत, श्री अरुण पुरोहित व श्री एस. पी रंगा ने मंच की व्यवस्था संभाली।

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