' विलक्षण प्रेम- कथा' "सोलमेट "

पुस्तक --सोलमेट ( उपन्यास ) लेखक -- धर्मपाल साहिल
प्रकाशन -- इंडिया नेटबुक्स प्राईवेट लिमिटेड
प्रथम संस्करण --2022 पृष्ठ संख्या --136 मूल्य ---450

उपन्यास का कथानक एक विलक्षण प्रेम कथा को लेकर चला है। प्रेम के अनेक रूप हैं, उनके अलग- अलग रंग हैं, कभी जुनून तो कभी आत्मसमर्पण, कभी विश्वास तो कभी धोखा ।कभी-कभी तो प्रेम विध्वंसक रूप भी धारण कर लेता है जो हमें स्वकेन्द्रित कर स्वार्थी बना देता है । जीवन में घटित होने वाली छोटी- बड़ी घटनाएं जिन्दगी को बदल देती हैं।

० सुरेखा शर्मा , समीक्षक / लेखिका ० 

' विलक्षण प्रेम- कथा' 'जिस्म की बात नहीं थी उनकी रूह तक जाना था, लंबी दूरी तय करने में वक्त तो लगता है ।'''हम पति -पत्नी तो रेल की पटरियों की भाँति साथ-साथ रहकर भी अलग-अलग थे। जिस पर हमारी गृहस्थी की रेलगाड़ी चल रही थी। कभी तेज कभी धीमी, कभी हिचकोले खाती, कभी रुक- रुक कर । हमारी सोच और पसंद अलग होते हुए भी, हम जूते के डिब्बे में,एक दूसरे से विपरीत दिशा में रखे जूतों की भाँति साथ-साथ जीवन गुजार रहे थे। "
उपर्युक्त पंक्तियाँ हैं वरिष्ठ साहित्यकार राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित अनेक विधाओं में लेखन करने वाले धर्मपाल साहिल के सद्यप्रकाशित उपन्यास 'सोलमेट' से। 'सोलमेट' शीर्षक से ही अनुमान लग जाता है कि उपन्यास का कथानक एक विलक्षण प्रेम कथा को लेकर चला है। प्रेम के अनेक रूप हैं, उनके अलग- अलग रंग हैं, कभी जुनून तो कभी आत्मसमर्पण, कभी विश्वास तो कभी धोखा ।कभी-कभी तो प्रेम विध्वंसक रूप भी धारण कर लेता है जो हमें स्वकेन्द्रित कर स्वार्थी बना देता है । जीवन में घटित होने वाली छोटी- बड़ी घटनाएं जिन्दगी को बदल देती हैं। लेकिन यहां हम जिस प्रेम की बात कर रहे हैं उसमें गहराई भी है और ऊँचाई भी। उपन्यास को पढ़कर पाठक सोचने पर विवश हो जाता है कि क्या ऐसा प्रेम भी होता है जिसकी आहट भी न हो और ताउम्र निभाया भी जाए ? 

शायद इसीलिए उस प्रेमी को ही 'सोलमेट' कहते हैं। कसी कवि ने ठीक ही कहा है , ''कई बार खूबसूरत- सा एक पल भी किस्सा बन जाता है और न जाने कौन जिन्दगी का हिस्सा बन जाता है।" ठीक उसी तरह उपन्यास के नायक प्रोफेसर चंद्रप्रकाश शशि के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ । पहाड़ी क्षेत्र के पिछड़े हुए गाँव में प्रथम नियुक्ति जब अध्यापक के रूप में हुई तो वहां नायिका संगीता से मुलाकात हुई जो अपने नाना के यहाँ छुट्टियाँ बिताने आई हुई थी ,उसके सौंदर्य व आकर्षक व्यक्तित्व ने नायक को अपने मोहपाश में इस तरह जकड़ लिया कि दिन रात उसी के ख्यालों में खोकर बीतने लगे । धीरे-धीरे मुलाकाते बढ़ने लगी। थोड़े से समय में एक दूसरे के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानने की कोशिश करते ।संगीता को लेकर नायक ने मन ही मन कई तरह के रंगीन सपने देखने शुरू कर दिए और एक दिन मोहल्ले में रहने वाले मास्टर भजन लाल ने पूछ ही लिया -'क्या ख्याल है तुम्हारा संगीता के बारे में ? 

कहो तो बात चलाऊँ उसके नाना से?' 'अंधा क्या चाहे दो आँखें' नायक को बिना कुछ कहे अपना सपना साकार होते लगा। दोनों ही एक दूसरे को पसंद करते थे। संगीता के परिवार की तरफ से हाँ थी।बस ,अब इन्तज़ार था तो अपने माता-पिता की सहमति का ।लेकिन विधि का विधान तो कुछ और ही था। माँ के पत्र से पता चला कि पिता अधरंग की बिमारी के कारण अस्पताल में हैं जो जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे हैं। इसी प्रकार सेवा करते-करते कई महीने गुजर गये पिता के ठीक होने की कोई उम्मीद नज़र नहीं आ रही थी ,लगता था जिन्दगी ठहर -सी गई और संगीता के साथ जीवन गुजारने के सभी सपने मिट्टी में मिल गये थे। संगीता रूपी माला का मनका, कहीं और पिरो दिया गया। परिवार व समाज की व्यवस्था के कारण उनका प्रेम फलीभूत नहीं हो पाया जो अंत तक दोनों को सालता रहता है ।

14 वर्षों बाद संगीता का अचानक मिलना नायक की उम्मीद से परे था। उसे देखकर मन ने एक शायर की पंक्तियों को दोहरा दिया ''तुम मुखातिब भी हो,करीब भी ।तुमको देखूँ या तुम से बात करूँ।'
दोनों परिवार एक दूसरे के पड़ोसी बनने के साथ -साथ एक- दूसरे के सुख-दुख के साथी भी बन गए ।घनिष्ठता बढ़ती गई । नायक के मन में बार- बार एक ही सवाल उठता कि वक्त ने इतने वर्षों बाद एक बार फिर किस मोड़ पर ला कर आमने-सामने कर दिया। वक्त ने बंद मुठ्ठी में और क्या -क्या रहस्य छुपा रखे हैं।पत्नी के सामने संगीता के साथ अतीत के संबंधों को उजागर न हों इसका विशेष ध्यान रखा जाता । शशि व संगीता का प्रेम आत्मिक, अलौकिक, अनूठा व अद्भुत था ।शारीरिक रूप से दूर रहते हुए भी वे आत्मिक रूप से जुड़े हुए थे । उनकी आत्माएँ एक दूसरे के लिए समर्पित थी।इसका एहसास एक दूसरे को संगीता की 25 वीं सालगिरह पर हुआ। जब मधुर कंठ से गाए गये गीत के बोल व नायिका की अदा ने नायक को मदहोश कर दिया। मन की तारें जुड़ गईं थी

।कुछ भी तो नही बदला था 25 वर्षों में।उनके जज़्बात, ,चाहत, उत्कंठा, सब सपने दिलों में थे। यह सब नायक की समझ से परे था।.संपूर्ण उपन्यास में आन्तरिक प्रेम की तरंगे प्रवाहित होती रहती हैं।जो किसी को प्रत्यक्ष दिखाई नहीं देती। नायक की छवि अध्यापक के साथ-साथ साहित्यकार के रूप में भी स्थापित हो गई थी।नायक के सामने पत्नी नेहा का वर्तमान और संगीता का अतीत आकर खड़ा हो गया था । स्थितियां ठीक चल रही थी कि चलते-चलते राह में एक लच्छी नाम का काँटा जिसे सभी तैतया भी कहते थे अपने नाम के अनुरूप उसने ऐसा डंक मारा कि नेहा और संगीता की जिंदगी में जहर घोल दिया । लेकिन सफल व्यक्ति तो वही कहलाता है जो अपने जीवन की कांटो से भरी राह से पुष्प चुन कर काँटों को हटा कर आगे चलता रहे। नायक ने अपनी सूझबूझ का परिचय देते हुए स्थिति को अनुकूल बना लिया ।
'सोलमेट' एक विलक्षण प्रेम कथा है जो प्रेम के वास्तविक रूप को परिभाषित करती है। 

प्रेम कथानक को लेकर चलने वाला यह उपन्यास मनोवैज्ञानिक सत्य को प्रस्तुत करता है और अनेक घटनाओं का विस्तृत ब्योरा देते हुए आगे बढ़ता है । मन में उपजे प्रेम के बीज सरलता से नष्ट नहीं किए जा सकते।परिस्थितियों के वशीभूत अवचेतन मन से चले तो जाते हैं,किन्तु जड़ से समाप्त नहीं होते। यही है सोलमेट के नायक -नायिका की स्थिति । जीवित रहना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और प्रेम इसकी संजीवनी है। विस्तार से जिसका आनन्द पाठक उपन्यास पढ़कर ही उठा सकेंगे ।

आंचलिक परिवेश में जन्में पात्र और घटनाएँ मंथर गति से आगे बढ़ते हैं। परिवेश की व्यापकता इस उपन्यास की विशेषता कही जा सकती है । उपन्यास रोचक है ,संवाद व शीर्षक छोटे -छोटे सार्थक व दिल को छूने वाले हैं जैसे -खुलते पृष्ठ, मेरे साथ -साथ,फारगेट मी नाॅट ,जम के बरसो। उपन्यास की कथा नदी के प्रवाह की तरह बहती है लेकिन कहीं-कहीं जब अवरोध उत्पन्न होने लगता है तो नायक उन्हें भी पार कर जाता है । रोमांस और चुभन का विरोधाभास बखूबी दिखाया गया है । कहीं-कहीं उपन्यास में भावुकता सहज से असहज होती हुई जीवन की भरपूर व्याख्या करती है । प्रस्तुत कृति 'सोलमेट' साहित्यधर्मी डाॅ धर्मपाल साहिल के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का दस्तावेज है । कहानी लीक से हटकर अंत तक आते -आते नयी जिज्ञासा जगाती है और अंत में चौंका दने वाली है। जब नायिका को मरणासन्न स्थिति में धरती पर लिटाया गया तो नायक स्वयं को रोक न सका और और रूँधे कंठ से बुदबुदाते हुए बोला-'संगीता जी देखो !मैं आया हूँ- चंद्रप्रकाश........शशि...संगीता जी एक बार आँखें खोलकर तो देखो--।'

रिश्तेदारों के रोकने के बाद भी वह यही बात दोहराता रहा -'संगीता जी, प्लीज एक बार आँखे खोलो न !' उधर गीता का अठाहरवां अध्याय समाप्त होने को था और इधर संगीता की सांस सामान्य स्थिति में चलने लगी थी। एक करिश्मा हुआ और नायक शशि की आत्मा की पुकार संगीता की आत्मा ने सुन ली थी। नायिका के हाथ का स्पंदन नायक को महसूस हुआ और उसके हाथ को हाथ में लेकर आश्वस्त हो गया ।
उपन्यास 'सोलमेट' में मार्मिक बिंब यत्र-तत्र दृष्टिगत होते हैं। जीवन की आकांक्षाएं रोज करवट लेती दिखाई देती हैं। शिल्प की दृष्टि से कृति अत्यंत सफल है ।नायक नायिका के प्रसंगों को उपन्यासकार ने पूरी मर्यादा के साथ बयान किया है । जहां तक भाषा का प्रश्न है तत्सम शब्दावली के साथ उर्दू एवं देशज शब्दों का भी प्रयोग किया गया है ।उपन्यास के कथानक में कसावट है ।  
कथा को इतना सीमित किया कि कथा कहीं भी अरूचिकर नहीं लगती । उपन्यास में लेखक ने कुछ अनूठे एवं उल्लेखनीय उपमानों,प्रतीकों एवं बिंबों का सहारा लिया है है । उपन्यासकार के पास एक नई सोच,कहानी कहने की कला एवं रूचिकर कथानक है। प्रेम की नयी परिभाषा को गढ़ता उपन्यास है " सोलमेट "। उपन्यासकार बधाई के पात्र हैं। हिन्दी साहित्य जगत में कृति का हृदय से स्वागत होगा --

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