80 कली का घाघरा, कुर्ती-कांचली और आभूषण पहनी महिलाओं द्वारा पारंपरिक नृत्य

० अशोक चतुर्वेदी ० 
150 कलाकारों ने बांधा समां, लोकरंग में जोश की झलक। 80 कली का घाघरा, कुर्ती-कांचली और आभूषण पहनी महिलाओं द्वारा पारंपरिक नृत्य- लोकरंग महोत्सव का तीसरा दिन
जयपुर-देश के विभिन्न क्षेत्रों की लोक संस्कृति की झलक, उत्साह और जोश जवाहर कला केंद्र की ओर से आयोजित लोकरंग महोत्सव के तीसरे दिन कुछ ऐसा ही नजारा दिखा। मध्यवर्ती और शिल्पग्राम दोनों में लगभग 150 कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों से समां बांधा। शिल्पग्राम में लगा राष्ट्रीय हस्तशिल्प मेला लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। हस्तशिल्प उत्पादों की स्टाॅल्स, विभिन्न राज्यों के व्यंजन चखने का मौका और मनोरंजक गतिविधियां आगंतुकों को सभी एक ही जगह मिल रहे हैं। ढलती शाम के साथ ही लोगों ने यहां अलगोजा वादन, तेराताली और हेला ख्याल प्रस्तुति का आनंद लिया।
तमिलनाडु के थपट्टम लोक नृत्य के साथ शुरुआत हुई तो मध्यवर्ती मानो जवाहर कला केंद्र का ऊर्जा केंद्र बन गया हो। इसके बाद बीन, भपंग जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन गूंज उठी। मधुर धुन और ढोलक की थाप के साथ पुरुष कलाकारों ने घुंघुरू बांधकर जिस बेफिक्री से नृत्य किया उसने राजस्थानियों की जीवंतता को बखूबी जाहिर किया। समूह के अगुआ 72 वर्षीय राम कुमार नाथ ने कहा कि लोकरंग उत्सव लुप्त होती लोक कलाओं को जानने के मौके की तरह है। उन्होंने यह भी कहा मंच और बीन वादन ही उनका जीवन है।

गुजरात के गरबे के बाद चकरी नृत्य की प्रस्तुति ने लोगों का ध्यान खींचा। 80 कली का घाघरा, कुर्ती-कांचली और आभूषण पहनी महिलाओं ने पारंपरिक नृत्य के जरिए हाड़ौती अंचल की संस्कृति से रूबरू करवाया। पहली फसल कटने के अवसर पर किए जाने वाले ओडिशा के रसकेलि नृत्य की प्रस्तुति ने फिर ऊर्जा संचार किया। कलाकारों ने तारतम्यता को बरकरार रखा। जोश के साथ शुरू हुई प्रस्तुति करतब और उल्लास के साथ खत्म हुई।

इसके बाद बीहू और होली नृत्य ने महफिल सजाए रखी। अंत में हुई रंगरेज प्रस्तुति बड़ी खास रही। इसमें कथक और कालबेलिया नृत्य का समागम देखने को मिला। कथक और कालबेलिया का ऐसा संयोजन देख लोग रोमांचित हो उठे। कालबेलिया का जोश और कथक में दिखने वाला फुटवर्क बड़ी नजाकत के साथ दर्शाया गया।

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