केंद्र और दिल्ली सरकार की जिम्मेदारी पर सवाल उठाना  न्यायोचित है


विजय सिंह बिष्ट


हिंदुत्व की परिभाषा राजनीति के चस्मे में जिस रूप से देखी जा रही है वह मात्र केवल सत्ता प्राप्ति के लिए जन मानस को बरगलाने का एक माध्यम बनाया जा रहा है। अखण्ड भारत के मानचित्र को हम छठवीं कक्षा में अफगानिस्तान पाकिस्तान ब्रह्मा से लेकर जावा सुमित्रा तक अंकित करते थे। शीर्ष में कश्मीर और अंत में श्री लंका को दिखाया जाता था। नाम हिंदुस्तान । पर्वतों में हिंदू कुश पर्वत, सिंधु नदी,को प्रमुखता से दिखाया जाता था। हमारी पाठशालाओं में दीवार पर भारत माता के चित्र सहित मानचित्र बनाना आम बात थी।


भाषा हिंदी थी, अंग्रेजी के स्थान पर संस्कृत विषय या कोई अन्य भाषा चुनना होता था। सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तां हमारा गाया जाता था।हिंन्दू मुस्लिम,सिख ईसाई आपस में हैं भाई भाई। सामान्य उद्घोष  थे। घर हो या पाठशाला हमें सिखाया जाता था हिंदू की परिभाषा "मन्शा बाचा कर्मणा"मन में जो सोचे,वही बोले और उसी को करें। लंम्बी चोटी धारण इस लिए की जाती थी कि मुसलमान भाई चोटी नहीं रखता था। अलग अलग धर्मों की निशानियां भी अलग ही थी। अपने मंदिर , मस्जिद , गुरुद्वारे और चर्च भी धर्म के आधार पर बनाये गये। भाषाओं की विविधता भी देश को अनेकता में एकता को बांधे रही। देश राजनीति की इस उठापटक में शामिल नहीं था। देश में रहने वाला भारतीय ही नहीं हिंदुस्तानी था। जैसे जैसे राजनीति में स्वार्थ की बू आनी आरंभ हुई और हार जीत की स्पर्धा  पैदा हुई समाज को आपस में बांटना आरंभ हो गया। आज भी अंग्रेजों के नक्शे-कदम बांटो और राज करो को ही चरितार्थ किया जा रहा है सच्चाई यह भी है जो लोग अंग्रेजों के पिठ्ठों रहे हैं उन्ही लोगों का समाज में बर्चस्व रहा है।वही गांव से लेकर शहर तक समाज में अग्रण्य रहे हैं।


और वर्तमान में समाज का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। हर समाज का व्यक्ति मंदिर मस्जिद और गुरद्वारों में अपनी मनोभावों और मनोकामना की पूर्ति के लिए जाता है। इसमें आलोचना कहां से आगयी। भारत की धरती में हर नदी में हर मंदिर मठ में जाने का सबका हक है। ईश्वर किसी की अपनी धरोहर नहीं है। टीबी चेनलों पर जब भी इस प्रकार के आयोजन किए जाते हैं लगता है ये गिने चुने लोग पार्टी के आधार पर धर्म की परिभाषा कर रहे हैं। हर पार्टी की अपनी मर्यादा हो सकती है लेकिन धर्म की एक निश्चित मर्यादा होती है। नेताओं का क्या धर्म है सेवा करना ,सबके हितों की रक्षा करना। देश देखता है नेताओं के अभद्र क्रियाकलापों को उनकी स्वेच्छाचारिता के कामों की आलोचनाओं की। देश एक जीवंत बगिया है इसमें कई रंग के फूल हैं। यहां संजीवनी भी है रत्नों के भंडार भी हैं। अमृत की धाराएं भी हैं।


इसके किसी भी धर्म की मर्यादा को ठेस नहीं पहुंचाई जानी चाहिए। हम यदि सम्मान चाहते हैं तो पहले दूसरों को सम्मान देना सीखें। धर्म के आधार पर देश की अखंडता को अपने स्वार्थ के लिए ताक पर रखना किसी के लिए हितकर नहीं होगा।  दिल्ली में नर संहार के लिए कौन जिम्मेदार है। आज हर तपके का आदमी सड़क पर न्याय मांगने के लिए निकला है। न्यायलय  के वकीलों से लेकर आम लोग सड़कों पर उतर आए हैं। केंद्र और दिल्ली सरकार की जिम्मेदारी पर सवाल उठाना  न्यायोचित है पुलिस के रवैए को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। मरता गरीब है उसी के बल पर नेता जीतकर राज करता है। लेकिन दुःख तब होता है जब लाशों के ऊपर राजनीति होती है।पक्ष और विपक्ष, के ठेकेदार स्क्रीन पर अपने को कितना ईमानदार बताते हैं।कई चेनलों के एंकर मात्र इसलिए बहस करवाते हैं कि हिंदू मुसलमान  लड़वाकर उनके परिवार का गुजारा होता है। सच्चाई जान कर भी उसको जलेबी की चासनी में डुबाया जाता है। जनता इस लिए अपने नुमांइदों को चुनती है कि वह जन मानस के लिए अच्छा सोचें, अच्छा करें।जिन के कंधों पर देश का भार सौंपा गया है उन्हें न्यायोचित होकर जन हित में काम करना चाहिए। आशा करते हैं कि केंद्र और दिल्ली सरकार इन विभीषिकाओं को मध्यनजर रखते हुए पीड़ित परिवारों को सहायता देने की कृपा करेंगे। लाशों के ऊपर विसात बिछाकर शतरंज खेलना शोभा नहीं देता।