Sunday, May 17, 2020

पलायन का अर्थ घर छोड़कर जाना नहीं था



विजय सिंह बिष्ट 


जमाने में एक कहावत थी जाओगे जहां लौट के आओगे वहां,यह कहावत जीवन के हर पहलुओं को चरितार्थ करती थी।
पलायन का अर्थ घर छोड़कर जाना नहीं था। उसमें अवज्ञा शब्द जो उचित की अवहेलना थी, और  ठोकर खाकर फिर उसी बात को मान लेना लौटकर आना कहलाता था।यह प्रकृति का नियम भी है। जाड़ा,गर्मी  ऋतु परिवर्तन और पुनः लौटना कर आना सृष्टि का लौकिक क्रम है।


महामारी के इस तांडव को देखते हुए यह लगता है कि हम लोगों ने जो अपने गांव और घर छोड़ दिए थे जिनकी यादें थूमिल हो चुकी थी,उन राहों को जिन्हें हम भूल चुके थे, आज अपनी जान की बाजी लगाकर  अंन्धनयन हो गांव लौट रहे हैं।  जीवन की अंन्धाधुन्ध इस प्रतियोगिता में कहां हार और जीत है कोई अंदाजा नहीं है। कितने लोग भयातुर होकर छिपे छिपाये मौत को गले लगाकर रास्ते में ही कालकवलित हो गये। फिर भी रेलवे स्टेशनों पर मोटर गाड़ियों और अन्य बाहनों की तलाश में भागे जा रहे हैं। रोग का संक्रमण शत्रु भीड़ में छिपा हुआ है, कब अपना आक्रमण करदे यह वैज्ञानिकों, चिकित्सकों को भी नहीं पता है। हां इतना अवश्य पता है अपनों से भी दूरी बना के रखो चाहे आप जिस स्थिति में हैं।  पहाड़ की जवानी और पहाड़ का पानी वहां रुकता नहीं, लेकिन आज वह लौटकर पहाड़ चढ़ने लगा है। बिना मौसम के पहाड़ों  में बरसात और बर्फबारी हमने कभी नहीं देखी थी आज हरदिन बरसात और ऊंची चोटियों में बर्फ पड़ती दिखाई देती है। लोग एनकेन प्रकारेण गांव जा रहे हैं, व्यवस्थानुकूल उन्हें घरों और गांव में प्रवेश नहीं करने दिया जा रहा है।


*ये लोग *जो विद्यालय नहीं गये अथवा आधी अधूरी पढ़ाई छोड़ कर शहरों की ओर नौकरी की तलाश में बर्षो पहले चले गए थे आज उन्ही विद्यालयों में क्वारंनटाइन में रखे गए हैं।कल इनका क्या होगा कह नहीं सकते। खेत खलिहान बंजर हैं, मकान अधिकांश टूटे पड़े हैं। जंगली जानवरों ने फसलें चौपट कर दी हैं। शहरों से लौटने वाले ये लोग नौकरी के अभाव में लौटने के लिए मजबूर थे,वास्तव में छोटी मोटी नौकरी न अपना घर और ऊपर से तालाबंदी कहां जाय। अब समस्या गांव में भी है यदि इन लोगों के द्वारा संक्रमण फैलता है तो गांव के गांव रोगग्रस्त हो जायेंगें। लोग तनाव में भी है कि ऐसे में इन लोगों का आना हितकर नहीं है। विकास क्षेत्र स्तर से जो लिस्टें आ रही हैं उत्तराखंड के भविष्य के लिए शुभ संदेशजनक नहीं है। यह स्थिति तो तब की है जब तालाबंदी मजबूती  से अपनाई गई थी।


जब इसमें और ढील दी जायेगी तब भयानक रूप धारण न करें। केंद्र सरकार के द्वारा ऐसा भी लगता है कि लोग आत्मनिर्भर बनकर अपना संरक्षण स्वयं करें, साथ में राज्य सरकारें भी जनहित में उत्तरदायित्व  निभाने में सक्षम हों आशा है उत्तराखण्ड सरकार जन जीवन रक्षण के लिए सतत् प्रयत्नशील होकर अपना योगदान देने में समर्थ होगी।


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