आखिर उत्तराखण्ड की स्थाई राजधानी कहां है


विजय सिंह बिष्ट


उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण। उत्तराखंड के राज्यपाल ने ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण को अनुमोदित कर उत्तराखण्ड सरकार को एक बहुत बड़ा तोहफा दे दिया है। लेकिन जन भावनाओं को किसी भी मानक पर नहीं तोला गया। आज वर्षो पहले चलाये गये जन आन्दोलन का ह्रस बंदर बांट के रूप में उन आंदोलनकारियों का बलिदान नहीं,वरन सत्तासीन सरकारों की उदासीनता ही मानी जायेगी।


आज किसी महानुभाव का एक वाक्य कि अठ्ठनी तो मिली क्या उस समय के मुलायम सिंह यादव की क्रूरता भरे अत्याचार का पारितोषिक है, नहीं उत्तराखण्ड के वलिदानियों के खून की कीमत केवल गैरसैंण राजधानी थी और होनी चाहिए। उस समय जो जन शैलाव गुफाओं और कंदराओं से सड़कों पर उतर आया था एक ही नारा था उत्तराखंण्ड राज्य और प्र्रदेश की राजधानी गैरसैंण हो, राज्य प्राप्ति के बाद दोनों सरकारें देहरादून में सत्तासीन हुई और इतने लम्बे समय के बाद भी गैरसैंण की राजधानी को भूलकर केवल देहरादून की भीषण गरमी से बचने के लिए गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने जा रही है। यह अंग्रेजी राज्य की याद दिलाता है जो इतिहास के पन्नों में सिमट कर गया है। देहरादून  इतना गरम भी नहीं होता है कि वहां रहना और कार्य करना कठिन हो, यह उतराखंडियों को मात्र आधा अधूरा संतोष दिलाना मात्र कहा जायेगा।


यक्षप्रश्न यह है कि सत्तासीन सरकार यह तो स्पष्ट करें कि आखिर उत्तराखण्ड की स्थाई राजधानी कहां है। ताकि जनता जनार्दन ये समझ कर संतुष्ट हो जाय कि हमारी दो नहीं एक ही राजधानी है। अर्थ व्यवस्था की दयनीय स्थिति और कोरोना महामारी का तांडव क्या दो राजधानियों के निर्माण में सहायक होगा समय ही बताएगा। उत्तराखंड की जनता को आगे आकर यह निर्णय कर लेना आवश्यक है कि हम दो नावों में क्यों पांव रखें। प्रादेशिक संस्थाओं प्रबुद्ध जनों को अपनी  संरक्षण करने वाली सरकारों पर उचित आवेदनात्मक पहल करने का प्रयास अवश्य करना चाहिए।