अटूट आस्था,पूर्ण समपर्ण व श्रद्धा का महापर्व है छठ

विनोद तकियावाला 0
"छठी मैया देहु मोहे आशीष।जुग -जुग जीये मोहे ललवाना हे छठी मैया " ।"
अटूट आस्था व पूर्ण समर्पण का .महा पर्व छठ मानया जायेगा। इस वर्ष छठ पर्व 28 अक्टूबर से 31 अक्टूबर तक मनाया जाएगा। दीवाली के चौथे दिन से शुरु होकर सातवें दिन तक कुल 4 दिनों तक मनाया जाता है।इसमें पहले दिन यानी चतुर्थी को घऱबार साफ सुथरा करके स्नान करने के बाद खाना में चावल तथा चने दाल तथा लौकी का सादा सब्जी बनाया जाता है फिर खाया जाता है जिसे (नहा के खाना) नहा खाये कहते है।अगले दिन संध्या में पंचमी के दिन खरना यानी के गुड़ में चावल का खीर बनाया जाता है।उपले और आम के लकड़ी से मिट्टी के चूल्हें पर फिर सादे रोटी और केला के साथ मां को याद करते हुए अग्रासन निकालने के बाद धूप हुमाद के साथ पूजा के बाद पहले व्रती खाती है फिर घर के अन्य सदस्य खाते हैं।

इसी के साथ मां का आगमन हो जाता है। तत्पश्चात षष्टी के दिन घर में पवित्रता एवं शुद्धता के साथ उत्तम पकवान बनाये जाते हैं। संध्या के समय पकवानों को बांस के डालों तथा टोकरीयों में भरकर नदी, तालाब,सरोवर आदि के किनारे ले जाया जाता है।जिसे छठ घाट कहा जाता है।फिर व्रत करने वाले भक्त उन डालों को उठाकर डूबते सूर्य (परसुता) एवं षष्टी माता को अर्घ्य देते हैं।ताकि जाते हुए माता सभी दुख दर्द लेती जाये और फिर सूर्यास्त के पश्चात लोग अपने-अपने घर आ जाते हैं।
छठ व्रत के दौरान रात भर जागरण किया जाता है और सप्तमी के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में पुन: संध्या काल की तरह डालों में पकवान, नारियल,केला, मिठाई भर कर नदी तट(घाट)पर लोग जमा होते हैं।व्रत करने वाले सभी व्रतधारी सुबह के समय उगते सूर्य(उषा))को आर्घ्य देते हैं ताकि जीवन में नई उर्जा के संचार हो। इसमें अंकुरित चना हाथ में लेकर षष्ठीव्रत की कथा कही और सुनी जाती है।कथा के बाद छठ घाट पर प्रसाद वितरण किया जाता है और फिर सभी अपने-अपने घर लौट आते हैं। तथा व्रत करने वाले इस दिन पारण करते हैं। यह क्रम खरना के दिन से व्रती लगातार 36 घंटे निर्जल एवं निराहार रहते हुए व्रत करती है। इसलिए इसे कठिनतम व्रत कहा गया है।

कार्तिक मास में षष्ठी तिथि को मनाए जाने वाले छठ व्रत की शुरुआत रामायण काल से हुई थी।लोक मान्यताओं के अनुसार इस व्रत को त्रेतायुग में माता सीता ने तथा द्वापर युग में पांडु की पत्नी कुन्ती ने की थी जिससे कर्ण के रुप में संतान पाई थी। पांडव की पत्नी द्रौपदी ने भी इस व्रत को किया था।हिन्दू शास्त्रों के अनुसार भगवान सूर्य एक मात्र प्रत्यक्ष देवता हैं।वास्तव में इनकी रोशनी से ही प्रकृति में जीवन चक्र चलता है।इनकी किरणों से धरती में फल,फूल,अनाज उत्पन्न होता है । सूर्य षष्टी या छठ व्रत भी इन्हीं भगवान सूर्य को समर्पित है।इस महापर्व में सूर्य नारायण के साथ देवी षष्टी की पूजा भी होती है। छठ पूजन कथानुसार छठ देवी भगवान सूर्यदेव की बहन हैं और उन्हीं को प्रसन्न करने के लिए भक्तगण भगवान सूर्य की आराधना तथा उनका धन्यवाद करते हुए मां गंगा-यमुना या किसी अन्य नदी या जल स्त्रोत के किनारे इस पूजा को मनाते हैं। इस ब्रत को करने से संतान की प्राप्ति होती है तथा इस व्रत को करने वाले सभी प्राणियों की मनोकामना पूर्ण होती है।

यह पर्व कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाई जाती है। और यह भगवान सूर्य को समर्पित है।बिहार और पूर्वांचल के निवासी आज जहां भी हैं वे सूर्य भगवान को अर्ग देने की परंपरा को आज भी कायम रखे हुए हैं।यही कारण है कि आज यह पर्व बिहार और पूर्वांचल की सीमा से निकलकर देश विदेश में मनाया जाने लगा है।चार दिनों तक चलने वाला यह पर्व बड़ा ही कठिन है।इसमें शरीर और मन को पूरी तरह साधना पड़ता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान राम सूर्यवंशी थे और उनके कुल देवता सूर्यदेव थे। इसलिए भगवान राम जब लंका से रावण वध करके अयोध्या वापस लौटे तो अपने कुलदेवता का आशीर्वाद पाने के लिए उन्होंने देवी सीता के साथ षष्ठी तिथि का व्रत रखा और सरयू नदी में डूबते सूर्य को फल, मिष्टान एवं अन्य वस्तुओं से अर्घ्य प्रदान किया। सप्तमी तिथि को भगवान राम ने उगते सूर्य को अर्घ्य देकर सूर्य देव का आशीर्वाद प्राप्त किया। इसके बाद राजकाज संभालना शुरु किया। इसके बाद से आम जन भी सूर्यषष्ठी का पर्व मनाने लगे ।

एक अन्य कथा के अनुसार एक राजा प्रियव्रत थे उनकी पत्नी थी मालिनी,राजा रानी नि:संतान होने से बहुत दु:खी थे। उन्होंने महर्षि कश्यप से पुत्रेष्ठि यज्ञ करवाया। यज्ञ के प्रभाव से मालिनी गर्भवती हुई परंतु नौ महीने बाद जब उन्होंने बालक को जन्म दिया तो वह मृत पैदा हुआ।प्रियव्रत इस से अत्यंत दु:खी हुए और आत्म हत्या करने हेतु तत्पर हुए।प्रियव्रत जैसे ही आत्महत्या करने वाले थे उसी समय एक देवी वहां प्रकट हुईं।देवी ने कहा प्रियव्रत मैं षष्टी देवी हूं।मेरी पूजा आराधना से पुत्र की प्राप्ति होती है, मैं सभी प्रकार की मनोकामना पूर्ण करने वाली हूं।अत: तुम मेरी पूजा करो तुम्हे पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी। राजा ने देवी की आज्ञा मान कर कार्तिक शुक्ल षष्टी तिथि को देवी षष्टी की पूजा की जिससे उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई । और उसी दिन से छठ व्रत का अनुष्ठान चला आ रहा है।

इस त्यौहार को बिहार, झारखंड, उत्तरप्रदेश एवं भारत के पड़ोसी देश नेपाल में हर्षोल्लास एवं नियम निष्ठा के साथ मनाया जाता है। इस त्यौहार की यहां बड़ी मान्यता है। इस महापर्व में देवी षष्ठी माता एवं भगवान सूर्य को प्रसन्न करने के लिए स्त्री और पुरूष दोनों ही व्रत रखते हैं।व्रत चार दिनों का होता है पहले दिन यानी चतुर्थी को आत्म शुद्धि हेतु व्रत करने वाले केवल अरवा खाते हैं।तत्पश्चात षष्टी के दिन घर में पवित्रता एवं शुद्धता के साथ उत्तम पकवान बनाये जाते हैं।

कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष में दीवाली के चौथे दिन से शुरु होकर सातवें दिन तक कुल 4 दिनों तक मानाया जाता है। इसमें पहले दिन यानी चतुर्थी को घऱबार साफ सुथरा करके स्नान करने के बाद खाना में चावल तथा चने दाल तथा लौकी का सादा सब्जी बनाया जाता है फिर खाया जाता है जिसे(नहा के खाना)नहा खाये कहते है।अगले दिन संध्या में पंचमी के दिन खरना यानी के गुड़ में चावल का खीर बनाया जाता है।उपले और आम के लकड़ी से मिट्टी के चूल्हें पर फिर सादे रोटी और केला के साथ मां को याद करते हुए अग्रासन निकालने के बाद धूप हुमाद के साथ पूजा के बाद पहले व्रती खाती है फिर घर के अन्य सदस्य खाते हैं। इसी के साथ मां का आगमन हो जाता है। तत्पश्चात षष्टी के दिन घर में पवित्रता एवं शुद्धता के साथ उत्तम पकवान बनाये जाते हैं। संध्या के समय पकवानों को बांस के डालों तथा टोकरीयों में भरकर नदी, तालाब, सरोवर आदि के किनारे ले जाया जाता है।जिसे छठ घाट कहा जाता है। फिर व्रत करने वाले भक्त उन डालों को उठाकर डूबते सूर्य (परसुता) एवं षष्टी माता को आर्घ्य देते हैं।ताकि जाते हुए माता सभी दुख दर्द लेती जाये और फिर सूर्यास्त के पश्चात लोग अपने-अपने घर आ जाते हैं।

छठ व्रत के दौरान रात भर जागरण किया जाता है और सप्तमी के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में पुन: संध्या काल की तरह डालों में पकवान,नारियल,केला,मिठाई भर कर नदी तटय (घाट) पर लोग जमा होते हैं।व्रत करने वाले सभी व्रतधारी सुबह के समय उगते सूर्य (उषा)) को आर्घ्य देते हैं ताकि जीवन में नई उर्जा के संचार हो। इसमें अंकुरित चना हाथ में लेकर षष्ठीव्रत की कथा कही और सुनी जाती है। 'संध्या के समय पकवानों को बांस के डालों तथा टोकरीयों में भरकर नदी, तालाब, सरोवर आदि के किनारे घाट ले जाया जाता है।फिर व्रत करने वाले भक्त उन डालों को उठाकर डूबते सूर्य एवं षष्टी माता को आर्घ्य देते हैं। और फिर सूर्यास्त के पश्चात लोग अपने-अपने घर आ जाते हैं।

छठ व्रत के दौरान रात भर जागरण किया जाता है और सप्तमी के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में पुन: संध्या काल की तरह डालों में पकवान, नारियल, केला, मिठाई भर कर नदी तट पर लोग जमा होते हैं।व्रत करने वाले सभी व्रतधारी सुबह के समय उगते सूर्य को आर्घ्य देते हैं।अंकुरित चना हाथ में लेकर षष्ठी व्रत की कथा कही और सुनी जाती है। कथा के बाद प्रसाद वितरण किया जाता है और फिर सभी अपने-अपने घर लौट आते हैं तथा व्रत करने वाले इस दिन पारण करते हैं।इस पर्व के विषय में मान्यता है कि षष्टी माता और सूर्य देव से इस दिन जो भी मांगा जाता है वह मनोकामना पूरी होती है घुटने भर जल में खड़ी व्रती की सुप में बालक सूर्य की किरणें उतरती हैं तो लगता है जैसे स्वयं सूर्य बालक बन कर उसकी गोद में खेलने उतरे हैं।स्त्री का सबसे भव्य,सबसे वैभवशाली स्वरूप वही है।इस धरा को "भारत माता" कहने वाले बुजुर्ग के मन में स्त्री का यही स्वरूप रहा होगा।

कभी ध्यान से देखिएगा छठ पूजा के दिन जल में खड़े हो कर सूर्य को अर्घ दे रही किसी पुरुष -स्त्री को,आपके मन में मोह नहीं ब्लकि श्रद्धा उपजेगी।छठ पूजा वह प्राचीन पर्व है जिसमें राजा और रंक नदी के एक घाट पर माथा टेकते हैं,अपने आराध्य देवता को अर्ध देते हैं,और एक बराबर आशीर्वाद पाते हैं।धन और पद का लोभ मनुष्य को मनुष्य से दूर करता है,पर धर्म उन्हें साथ लाता है।अपने धर्म के साथ होने का सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि आप अपने समस्त पुरुखों के आशीर्वाद की छाया में होते हैं।छठ पूजा के दिन पूजा करने वाली महिलाए नाक से माथे तक सिंदूर लगा कर घाट पर बैठी स्त्री अपनी हजारों पीढ़ी की अजियासास ,ननियासास की छाया में होती है,बल्कि वह उन्ही का स्वरूप होती है।उसके हरी बॉस से बनी डाला व सुप में केवल फल फकवान नहीं होते, समूची प्रकृति होती है।वह एक सामान्य स्त्री सीनहीं,अन्नपूर्णा सी दिखाई देती है।ध्यान से देखिये!आपको उनमें कौशल्या दिखेंगी, उनमें मैत्रेयी दिखेगी,उनमें सीता दिखेगी,उनमें अनुसुइया दिखेगी, सावित्री दिखेगी...

 उनमें पद्मावती दिखेगी,उनमें लक्ष्मीबाई दिखेगी,उनमें भारत माता दिखेगी।इसमें कोई संदेह नहीं कि उनके आँचल में बंध कर ही यह सभ्यता अगले हजारों वर्षों का सफर तय कर लेगी।छठ डूबते सूर्य की आराधना का पर्व है। डूबता सूर्य इतिहास होता है, और कोई भी सभ्यता तभी दीर्घजीवी होती है जब वह अपने इतिहास को पूजे।अपने इतिहास के समस्त योद्धाओं को पूजे और इतिहास में छठ उगते सूर्य की आराधना का पर्व है। उगता सूर्य भविष्य होता है और किसी भी सभ्यता के यस्शवी होने के लिए आवश्यक है कि वह अपने भविष्य को पूजा जैसी श्रद्धा और निष्ठा से सँवारे... हमारी आज की पीढ़ी यही करने में चूक रही है, पर उसे यह करना ही होगा...यही छठ व्रत का मूल भाव है।मेरे देश की माताओं!परसों जब आदित्य आपकी सुप में उतरें,तो उनसे कहिएगा कि इस देश,इस संस्कृति पर अपनी कृपा बनाये रखें,ताकि हजारों वर्ष बाद भी हमारी पुत्र वधुएँ यूँ ही सज-धज कर गंगा के जल में खड़ी हों और कहें- "उगs हो सुरुज देव,भइले अरघ के बेर..."

यह महापर्व हम सब को एक बडी सीख देती है जिस का आज अस्त हो रहा उसका कल निशचित ही उदय होता है।अस्तगामी सुर्यकह रही हो,"देखो! तुम्हारे जीवन मे असंख्य झंझावातों को सहन करने के बाद भी हमारा वैभव कम नहीं हुआ है, हम सनातन हैं,हम भारत हैं।हम तबसे हैं जबसे तुम हो,और जबतक तुम रहोगे तब तक हम भी रहेंगे छठ पर्व मे अस्तगामी सूर्य को अर्धदिया जाता है।जो कि एक संदेश देता है हमे निराश नही होना चाहिए।पुनः कल पुरब दिशा मे उदित होने वाला भुवन भास्कार अपनी सत्पअश्व पर सवार होकर स्वर्णिम किरणे के साथ नई स्पूर्णा नई उमंग .नई उत्साह के साथ आते है जिन्हे अर्ध दे कर परब का समापन होता है।आज भी हम सभी कोरोना जैसी संकट से जीवन जीविका के जंग से जुझ रहा है।ऐसे मे हम सभी को जन कल्याण के लिए भी प्रार्थना करे ताकि कोरोना के काले बादल संकट छट जाय।मै छठ मैया से प्रार्थना व भगवान सूर्य से अर्ध अर्पण करेगें।

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