उत्तराखण्ड राज्य में चल रहे मानव-वन्यजीव संघर्ष

० उपान्त डबराल ० 
उत्तराखण्ड राज्य अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए विश्व विख्यात है। यहाँ कहीं बर्फ से ढंकी पर्वतों की चोटियाँ हैं तो कहीं हरे-भरे पहाड़, कहीं नदियाँ हैं तो कहीं झीलें। राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 71.05 फीसद क्षेत्र वनों के रूप में अधिसूचित है। इन वन क्षेत्रों में कई वन्यजीवों का बसेरा है। पर्यटन की दृष्टि से उत्तराखण्ड एक सुंदर और शांत प्रदेश है लेकिन ये इस प्रदेश का एक पहलू है। इस प्रदेश का दूसरा पहलू यहाँ के ग्रामीणों की दृष्टि से है, वे ग्रामीण जिनके गाँव वन्यजीवों से भरे वनों के संपर्क में हैं। उत्तराखण्ड में मानव-वन्यजीव संघर्ष (Human-Animal Conflict) एक संवेदनशील विषय है। जीवन चाहे मानव का हो या वन्यजीव का वह बहुमूल्य है। उत्तराखण्ड में वर्षों से चल रहे इस मानव-वन्यजीव संघर्ष में प्रति वर्ष कई मनुष्यों का जीवन समाप्त होता है।
उत्तराखण्ड में मानव-वन्यजीव संघर्ष विषय कितना गंभीर है यह हाल ही में जनपद अल्मोड़ा के सल्ट विकासखंड के मरचूला बाजार में हुई घटना से पता चलता है। 14 नवंबर की रात करीब 9 बजे एक बाघिन मरचूला के बाजार में आ पहुँची, जिसके बाद उस जगह भय का माहौल पैदा हो गया। लोगों ने इसकी सूचना वन विभाग को दी। जिसके बाद वन विभाग की टीम घटनास्थल पर पहुँची। वन विभाग की टीम ने बाघिन को भगाने के लिए हवाई फायर किए। इस मुठभेड़ में बाघिन की मौत हो गई। इस बाघिन की हलचल का प्रभाव जनपद अल्मोड़ा के मरचूला सहित जमरिया, सांकर, बलूली गाँव पर अधिक था।

मानव-वन्यजीव संघर्ष और इस घटना को करीब से जानने के लिए हमनें 34 वर्षीय मनोज शर्मा से बात की। मनोज वर्तमान में जमरिया गाँव के प्रधान हैं। मनोज ने बताया कि वह वन्यजीव और पर्यावरण प्रेमी हैं। उनका जीवन बचपन से ही ऐसे परिवेश में रहा है जहाँ वह वन्यजीव और पर्यावरण से जुड़े रहे हैं। मानव-वन्यजीव संघर्ष के बारे में बात करते हुए मनोज ने बताया कि उनके कई परिचित इस संघर्ष की भेंट चढ़ चुके हैं। वन्यजीव उनकी खेती को भी प्रभावित करते हैं, जिस कारण उनकी खेती को हानि पहुँचती है। सोमवार को मरचूला बाजार में मुठभेड़ के बाद मरी बाघिन के बारे में मनोज ने विस्तृत जानकरी दी। 

मनोज बताते हैं कि यह बाघिन बूढ़ी हो चुकी थी और शिकार के लिए गाँवों के आस-पास इसकी हल-चल अधिक हो चुकी थी। इस बाघिन का लम्बे समय से आतंक बना हुआ था, बीते छः महीनों में बाघिन द्वारा दो लोगों को मार दिया गया। 8 नवंबर को सुबह करीब 9 बजे जमरिया गाँव की लगभग 40 वर्षीय कमला देवी घास काटने निकली तो बाघिन द्वारा उन पर भी हमला किया गया इस हमले में कमला देवी गंभीर रूप से घायल हो गई। इस घटना के एक दिन बाद ही बाघिन ने दो बाइक सवारों पर शाम करीब 6 बजे हमला कर दिया। मुठभेड़ से एक दिन पहले रात करीब 2 बजे बाघिन की हल-चल को सीसीटीवी पर देखा गया, जिसमें बाघिन पहले मरचूला के पीएनबी बैंक के आस-पास घूमती है फिर एक घर में जाकर गाय को मार देती है। 

अगले दिन बाघिन रात करीब 9 बजे मरचूला के बाजार में आ पहुँचती है जहाँ लोगों के बीच भय का माहौल पैदा होता है। लोगों की सूचना पर वन विभाग की टीम घटनास्थल पर पहुँचती है। वन विभाग की टीम द्वारा कई हवाई फायर किए जाते हैं फिर भी बाघिन जंगल की ओर नहीं जाती बल्कि फायर होने पर वह आक्रमक हो जाती है। ये सब देखने के लिए लोग छतों पर आ जाते हैं जिस कारण वन विभाग की टीम के पास अब हवाई फायर करने का विकल्प नहीं रहता है। बाघिन के अधिक आक्रमक होने के कारण वन विभाग की टीम के एक सदस्य द्वारा हवाई फायर न कर पाने की स्थिति में जमीनी फायर की जाती है और इस फायर में बाघिन को गोली के कुछ छर्रे लग जाते हैं। 

लम्बी चली इस मुठभेड़ में बाघिन मर जाती है और लोग चैन की साँस लेते हैं। मनोज ने बताया कि भय के इस माहौल में मंदाल रेंज की वन विभाग टीम द्वारा शुरुआत से ही ग्रामीणों को सहयोग मिलता रहा। कई दिनों से बाघिन को पकड़ने के लिए पिंजरे लगाए गए साथ ही ग्रामीणों के बीच जन-जागरूकता फैलाई गई। यह था उत्तराखण्ड राज्य में चल रहे मानव-वन्यजीव संघर्ष का एक अध्याय। अब एक नजर इस वर्ष के शुरुआत से मध्य तक कुछ वन्यजीवों द्वारा किए हमलों से हुई मौतों और घायलों के आंकड़ों पर- बाघ के हमले में 10 लोगों की मौत, 4 घायल तेंदुए के हमले में 13 लोगों की मौत, 37 लोग घायल हाथी के हमले में 5 लोगों की मौत, 4 लोग घायल भालू के हमले में एक की मौत, 32 लोग घायल। हम मानव-वन्यजीव संघर्ष में वन्यजीव संरक्षण की बात तो करते हैं परंतु वन्यजीव संरक्षण के साथ-साथ इस संघर्ष में मानव जीवन संरक्षण भी आवश्यक है।

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